Bhakti movement

भक्ति आंदोलन
Bhakti movement
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भक्ति शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख  श्वेताश्वतर उपनिषद में मिलता है लेकिन भक्ति शब्द का
व्यापक प्रयोग श्रीमद्भागवत गीता में मिलता है गीता में ईश्वर प्राप्ति के तीन मार्ग बताए गए हैं
कर्म मार्ग, ज्ञान मार्ग, भक्ति मार्ग,
भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि शंकराचार्य ने तैयार की थी इन्होंने चारों दिशाओं में चार मठ
स्थापित करवाएं जो कि निम्न प्रकार है

उत्तर      ज्योतिष पीठ     बद्रीनाथ उत्तराखंड
दक्षिणी    श्रृंगेरी पीठ       मैसूर कर्नाटक
पूर्व         गोवर्धन पीठ     पूरी उड़ीसा
पश्चिम      शारदा पीठ       द्वारिका गुजरात

भक्ति आंदोलन का प्रारंभ दक्षिण भारत के अलावा संतो ने किया था
दक्षिण भारत में वैष्णव संतों को अलाबार  शिव संतो को नयनार कहा जाता था
दक्षिण भारत में अलावार और संतान की संख्या 12 नयनार संतों की संख्या 63 थी  

रामानुजाचार्य
 रामानुजाचार्य को भक्ति आंदोलन का जनक कहा जाता है इनका दार्शनिक सिद्धांत
विशिष्टाद्वैतवाद था रामानुजाचार्य ने  श्री भाष्य नामक ग्रंथ लिखा जो कि ब्रह्मसूत्र की टिका है
इन्होंने श्री संप्रदाय की स्थापना की जिसका मुख्य केंद्र श्रीरंगम वैकेंसी थे रामानुजाचार्य
चोल नरेश क्लोतुग प्रथम के समकालीन थे
निंबार्काचार्य
निंबार्काचार्य का दार्शनिक सिद्धांत द्वैताद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध था इन्होंने सनक संप्रदाय की
स्थापना की थी राजस्थान में  सनक संप्रदाय का प्रमुख केंद्र सलेमाबाद अजमेर में है
मध्वाचार्य
इनका दार्शनिक सिद्धांत द्वैतवाद था इन्होंने ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की इन्हें आनंद
तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है इन्हें वायु का अवतार माना जाता है
वल्लभाचार्य
वल्लभाचार्य का दार्शनिक सिद्धांत शुद्धाद्वैतवाद के नाम से जाना जाता था इन्होंने  रूद्र
संप्रदाय की स्थापना की इन्हें विष्णुस्वामी के नाम से भी जाना जाता है
चैतन्य महाप्रभु
चैतन्य महाप्रभु बंगाल उड़ीसा में भक्ति आंदोलन का प्रचार प्रसार करने वाले दार्शनिक
थे इनका  वास्तविक नाम विशंभर था इन्हें गौरांग महाप्रभु के नाम से भी जाना जाता था
इन्होंने शिक्षाष्टक नामक ग्रंथ की रचना की थी गौरांग महाप्रभु ने संकीर्तन प्रथा को प्रारंभ  
किया था उड़ीसा का शासक प्रताप रुद्रदेव चैतन्य महाप्रभु का शिष्य था
रामानंद
उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन के जनक रामानंद को माना जाता है रामानंद रामानुजाचार्य
द्वारा स्थापित श्री संप्रदाय के पांचवे गुरु थे यह हिंदी भाषा में उपदेश  देने वाले प्रथम संत थे
रामानंद ने राम की उपासना पर बल दिया इन्होंने आनंद भाष्य नामक ग्रंथ लिखा जोकि  
ब्रम्हपुत्र की टिका है रामानंद नहीं रामावत संप्रदाय की स्थापना की थी रामानंद निम्नवर्ग के
लोगों को अपना शिष्य बनाने वाले भक्ति आंदोलन के प्रथम संत थे इन के 12 मुख्य थे
रैदास( चमार), कबीर( झूला), सेन( नाई), धना( जाट), पीपा( राजपूत), नामदेव( दर्जी)
            नोट  प्रमुख निर्गुण संत रैदास कबीर नानक और दादू थे
 

कबीर दास
 कबीर का जन्म 1398 में हुआ था कबीर सिकंदर लोदी का समकालीन था यह निर्गुण
धारा के संत थे इन्होंने सांप्रदायिक एकता पर बल देते हुए धार्मिक आडंबरों का विरोध
किया  कबीर के उपदेशों का संकलन बीजक नामक ग्रंथ में है बीजक का संकलन  
कबीर के शिष्य भागो दास ने किया था
तुलसीदास
तुलसीदास का जन्म 1532 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में हुआ था यह अकबर  और
जहांगीर के समकालीन थे इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे व माता का नाम हुलसी
और गुरु का नाम नरहरिदास था उनकी पत्नी रत्नावली थी इनकी मृत्यु 1623 में हुई थी
इनकी प्रमुख रचनाएं रामचरित्रमानस विनय पत्रिका कवितावली गीतावली कृष्ण गीतावली  
पार्वती मंगलम जानकी मंगलम
गुरु नानक देव
गुरु नानक देव का जन्म 1469 में तलवंडी पाकिस्तान में हुआ था वर्तमान में तलवंडी का
नाम बदलकर ननकाना साहब कर दिया गया है यह सिख पंथ के संस्थापक थे इनके
उपदेश गुरु ग्रंथ साहिब में है यह निर्गुण धारा के संत थे इन्होंने सांप्रदायिक सद्भावना पर
बल दिया  था
दादू दयाल
दादू दयाल का जन्म 1544 में अहमदाबाद लोधी राम नामक ब्राह्मण के घर हुआ
दादू को राजस्थान का कबीर कहा जाता है यह निर्गुण धारा के संत थे आमेर नरेश
भगवानदास उनका शिष्य था इन्होंने फतेहपुर सीकरी के इबादत खाने में अकबर से
धार्मिक चर्चा भी की थी दादू के 52 प्रमुख शिष्य थे जिन्हें 52 स्तंभ कहा जाता था
दादू पंथ का मुख्य केंद्र नरेना जयपुर में है दादू पंथ के सत्संग स्थल को अलदरीबा
कहा जाता है तथा पूजा स्थल को दादू द्वारा कहा जाता है दादू पंथ के पात संप्रदाय है
दादू के बाद उनका मुख्य उत्तराधिकारी गरीबदास बना  दादू के शिष्य सुंदर दास ने
नागा पंथ की स्थापना की नागा पंथ के सन्यासी सेना में भी भर्ती होते थे दादू का शिष्य
रजत जी जीवनभर दूल्हे के वेश में रहे  


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